चितौड़गढ़ में परमार युगीन समीधेश्वर प्रासाद
चितौड़ गढ़ में कीर्ति स्तम्भ और गौमुख कुंड के मध्य मोकल जी का मंदिर है। इसे समिद्धेश्वर , समाधीश्वर, या समीधेश्वर प्रासाद भी कहते हैं। यह मंदिर मूल रूप से परमार राजा भोज द्वारा बनवाया त्रिभुवन नारायण मंदिर है। विक्रम संवत 1330 के समरसिंह के चीरवा अभिलेख में भोजद्वारा बनवाया त्रिभुवनारायण और विक्रम संवत 1358 के चितौड़ से प्राप्त अभिलेख में भोज स्वामी जगती का वर्णन है। विक्रम संवत 1485 में महाराणा मोकल ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था इसलिए इसे मोकल जी का मंदिर कहा जाता है।
यह देवालय गर्भगृह, अंतराल, और मंडप में विभक्त है। शिखर कलश और आमलक युक्त है। उरूश्रृंगो से सुसज्जित शिखर काफी प्रभावी है। गर्भगृह में भगवान शिव की त्रिमुखी मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है। यह विशालकाय मूर्ति है। इसके छह हाथ है जिनमे भिन्न भिन्न आयुध है। इस मंदिर के मंडोवर में कई मूर्तियां उत्कीर्ण है।
एक दृश्य राजा की सवारी का है जिसमे प्रारंभ में बैल गाडियां और इसके आगे तीन पैदल सैनिकों का दृश्य उत्कीर्ण है, पीछे कई घुड़सवार है और इनके पीछे हाथी पर राजा रानी को बैठाया हुआ दिखाया गया है। देवी देवताओं की अन्य कई प्रतिमाएं भी दर्शनीय है जिसमें गणेश की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। मंदिर के सम्मुख एक मंडप है जिसमे नंदी की कलात्मक प्रतिमा विराजित हैं।
प्रतिहार साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तरी भारत में कई छोटे छोटेराज्य नए स्थापित हो गए हैं। इनमे मालवा के परमार , गुजरात के सोलंकी और अजमेर के चौहान बड़े प्रसिद्ध थे। मालवा के परमार राजा मूंज ने चितौड़ पर आक्रमण कर उसे विजित किया था। चितौड़ में शक संवत 1028 ईस्वी 1162 की एक प्रशस्ति मालवा के परमारो को मिली है। इस प्रशस्ति में 78 श्लोक है।
इसमें परमार भोज, उदयादित्य, और नरवर्मा का वर्णन है। इससे स्पष्ट है कि नरवर्मा के समय तक निश्चित रूप से चितौड़ पर परमारो का अधिकार रहा था। गुहिल सिर्फ पश्चिमी मेवाड़ तक ही सीमित रहे। परमार और गुहिल में वैवाहिक संबंध भी रहे। गुहिल विजय सिंह को उदयादित्य की पुत्री ब्याही गई थी।
चितौड़ में गुजरात सोलंकी राजा कुमार पाल के अभिलेख भी मिले हैं। विक्रम संवत 1207 के अभिलेख में वर्णित है कि वह सपादलक्ष विजय करके लौट रहा था तब मार्ग में रुककर चितौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर के दर्शन किए।
यह देवालय चितौड़ के सभी मंदिरों में सबसे आकर्षक है। पाटन पोल और रसिया छतरी इन दोनों अलग अलग दिशाओं के द्वारों से प्रवेश करते ही यह मंदिर सम्मुख दिखलाई पड़ता है।
संदर्भ पुस्तक चितौड़गढ़ का इतिहास लेखक आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर 🙏
ओम प्रकाश सोनी






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