अतिविशिष्ट मंदिरो का समूह बाड़ोली के मंदिर
बाड़ोली कोटा के पास प्रसिद्ध परमाणु ऊर्जा संयंत्र रावत भाटा से लगा हुआ एक मुख्य पुरातात्विक स्थल है। मुख्य शहर से कुछ दूर जंगल की हरियाली और बहते नाले की कल कल ध्वनि से गुंजित इस स्थान पर कुल नौ प्राचीन मंदिरों का समूह है। बाड़ोली आठवी नवमी सदी में शैव पूजा का केंद्र रहा है। ये नौ मंदिर शिव वैष्णव गणेश आदि को समर्पित है। इन मंदिरों को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का कार्य 1821 ई. में जेम्स टॉड ने किया था।
इन सभी मंदिरों को भारतीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है। ये मंदिर नाले द्वारा विभक्त दो अलग समूह में एक परिसर में स्थापित है। पहले समूह में कुल तीन मंदिर है जिसमे एक मंदिर एक कुंड के मध्य में बना हुआ है। इसमें एक मंदिर का मात्र गर्भगृह तथा अन्तराल शेष है। मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। मंदिर में कोई प्रतिमा शेष नहीं है। गर्भगृह में एक शिव लिंग स्थापित है।
दूसरा मंदिर गर्भगृह, अंतराल तथा अर्धमंडप में विभक्त हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में शेषशायी विष्णु प्रतिमा थी, जो अब कोटा के राजकीय संग्रहालय में संरक्षित है। तीसरा मंदिर एक कुंड के मध्य बना हुआ है। इसका गर्भगृह तथा मुखमंडप सादा हैं। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। गर्भगृह की तीनों दिशाओं में प्रवेश द्वार तथा पीछे की भित्ति में जाली बनी है।
नाले के उस पार शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश, त्रिमूर्ति , तथा एक बावड़ी बनी हुई है। इन मंदिरों में सबसे मुख्य मंदिर शिव को समर्पित घटेश्वर शिव मंदिर है। यह मंदिर गर्भगृह अंतराल और मंडप में विभक्त है। इसका प्रवेशद्वार बेहद ही अलंकृत है।गर्भगृह के ललाट बिंब पर शिव नटराज तथा द्वार शाखाओं पर शैव द्वारपालों का सुन्दर अंकन है। मंदिर की प्रमुख बाहरी ताखों में त्रिपुरांतक मूर्ति, नटराज एवं चामुण्डा की मूर्तियाँ जड़ी हुई है। अर्धमंडप में बना मकर तोरण द्वार राजस्थान के सभी तोरण द्वारों में सबसे श्रेष्ठ प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त एक त्रिमूर्ति महेश का मंदिर है।गर्भगृह की मूर्ति वस्तुतः महेश मूर्ति हैं, जिसके दोनों ओर ऊपर ब्रह्मा एवं विष्णु हाथ जोड़े हुए खड़े हैं। एक अन्य मंदिर गणेश को समर्पित है जिसमे नृत्य गणेश की पांच फीट ऊंची भव्य प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। अन्य मंदिर वामन और देवी को समर्पित है।
यहाँ एक मंदिर और था, जो अब पूर्णतः नष्ट हो चुका है, जिसका अनुमान प्रवेश द्वार की चौखट, सिरदल और दो स्तंभों के अवशेषों से होता है। यह मंदिर अवश्य ही लकुलीश का होगा, जैसा कि सिरदल के ललाट बिंब पर अंकित प्रतिमा से ज्ञात होता है। इन सभी मंदिरों के अलावा एक विशाल रंग मंडप और बावड़ी बनी हुई है।
बाडोली के सभी मंदिरों की गंगा- यमुना मूर्तियाँ अत्यंत आकर्षक हैं। एक हाथ में कलश तथा दूसरा कमर पर रखे अपने वाहनों पर खड़ी हुई बड़े आकार के गोल कुण्डल, हार, केयूर, मेखला, पैरों में आभूषण पहने हुए उत्कीर्ण हैं।
टॉड का यहाँ मिले दो अभिलेखों में से एक अभिलेख में संवत् 981 कार्तिक सुदी 12 को व्याकुलज द्वारा सिध्देश्वर के मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख है। दूसरा अभिलेख संवत 983 चैत्र सुदी 5 को व्याकुलज द्वारा शंभु के सुंदर मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। इस अभिलेख में अधिष्ठातृ देव का नाम झरेश्वर है, जो संभवतः घटेश्वर का ही दूसरा नाम है, क्योंकि इन मंदिरों के पास एक प्राकृतिक झरना है। बाड़ोली के मंदिरों का निर्माण आठवी से ग्यारहवीं सदी माना गया है। मूल रूप से ऐसा कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ जिससे इन मंदिरों के निर्माता आदि का पता चले।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा







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