चितौड़गढ़ का कुंभ स्वामी मंदिर
चितौड़गढ़ में कीर्ति स्तंभ के समीप ही कुंभ स्वामी का विशाल मंदिर अवस्थित है। ऐसा माना जाता है कि कीर्ति स्तंभ इसी मंदिर का ही भाग है। कीर्ति स्तंभ की प्रशस्ति के अनुसार महाराणा कुम्भा ने हिमालय के समान प्रसिद्ध और अनेक स्वर्ण कलशों से युक्त, सुमेरू पर्वत की शोभा से बढ़कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर तिलक एवम मुकुट स्वरूप कुंभ स्वामी का मंदिर बनवाया।कवि कल्पना करता है कि क्या यह कैलाश पर्वत का प्रतिनिधि, शंकर का अट्टहास, चांदनी का समूह है अथवा हिमालय का प्रतिनिधि है।
इसमें मुख्य मंदिर, कोली मंडप, प्रग्रीव मण्डप और श्रृंगार चौकी मंडप है। यह मंदिर एक ऊंची जगती पर बना हुआ है। इसके पास ही छोटे छोटे मंदिर भी बने हुए हैं। मंदिर के सामने चौकी पर गरुड़ की काले पत्थर से बनी सुन्दर प्रतिमा स्थापित है।यह मंदिर भगवान वराह को समर्पित है। कुंभलगढ़ प्रशस्ति में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
वराह मंदिर आठवी से नवमी सदी में विशेषकर बने हैं। इसका गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, जंघा भाग तो पूर्व मध्य युगीन अर्थात नवमी सदी का बना हुआ हैं। ये भाग पूर्ण रूप से सुरक्षित है। शेष भाग कुंभा ने बनाया हो। गर्भगृह के बाहर स्वतंत्र प्रदक्षिणा पथ सूर्य मंदिर चितौड़ शैली का ही है। यह भी मान्यता है कि यह मंदिर यहां स्थानांतरित किया गया है। कुम्भा के काल में मन्दिरों का जीर्णोद्धार भी बहुत हुआ है। वास्तु उद्धार धोरणी में इसकी विधि आई है।
कुंभ श्याम का यह मंदिर अपने ढंग का विशिष्ट मंदिर है। 12 वी सदी का एक शिलालेख कुमारपाल के शासन काल का चितौड़ से मिला है। इसमें वराह के मंदिर बनाने का उल्लेख है। यह ज्ञात नही हो सका कि वह मंदिर कहां है। शिल्प कला की दृष्टि से यह मंदिर बारहवीं सदी से बहुत पहले का है। अतेव यह मंदिर उससे भिन्न है।
ऐसा प्रतीत होता है कि अलाउद्दीन खिलजी के हमले के समय इस मंदिर के ऊपर का भाग खण्डित कर दिया गया था जिसे कुम्भा ने वापस बनाया था।
संदर्भ चितौड़गढ़ का इतिहास श्री कृष्ण जुगनू सर पृष्ठ 154
ओम प्रकाश सोनी




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