Wednesday, 3 January 2024

गुहिल कला का प्राचीन उदाहरण है ईसवाल का विष्णु मंदिर

गुहिल कला का प्राचीन उदाहरण है ईसवाल का विष्णु मंदिर

राजस्थान के उदयपुर से गोगुंदा जाने वाले ईसवाल गांव में एक प्राचीन विष्णु मंदिर अवस्थित है। पंचायतन शैली में निर्मित यह पांच मंदिर का समूह एक ऊंची चार दिवारी से सुरक्षित है। मुख्य मंदिर मध्य में शेष चार कोनो में चार लघु देवालय है। मुख्य मंदिर गर्भगृह अंतराल और मंडप में विभक्त है। शिखर अमलक और कलश युक्त है। मंडप पर गुम्बद बना हुआ है।

प्रवेशद्वार के ललाट बिंब पर गरुड़वाही विष्णु का अंकन है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ शिव और इंद्र की आकर्षक प्रतिमाएं जड़ी हुई है। गर्भगृह में भगवन विष्णु की काले पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है। चतुर्भुजी विष्णु को स्थानीय तौर पर चारभूजानाथ के नाम से पूजा जा जाता है। 

चार अन्य गौण मंदिर गणेश, शक्ति, शिव और सूर्य देव को समर्पित है। चारो मंदिर में गर्भगृह और मंडप निर्मित है। सभी मन्दिरों की दीवारों पर सूर्य, गणेश, शिव, विष्णु, चामुंडा, इंद्र, अग्नि अप्सरा आदि की प्रतिमाएं सज्जित है। मंदिर से विक्रम संवत 1161 और 1242 के दो अभिलेख मिले हैं जिस आधार पर इसे ग्यारहवीं सदी के उत्तरार्ध में निर्मित माना गया है।

मेवाड़ का प्रारम्भिक इतिहास पुस्तक( पृष्ठ 245 ) में आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर ने इस मंदिर की विशेष जानकारी उल्लेखित की है तदनुसार ईसवाल का यह पंचायतन विष्णु मंदिर गुहिल कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर में विक्रम संवत 1161 और 1242 के दो अभिलेख मिले हैं जिसमे इस मंदिर का नाम वोहिघस्वामी प्रासाद आया है। 

लघु मंदिरों में देवी का मंदिर मूलत कुबेर का मंदिर था। इसकेे जंघा भाग में उत्कीर्ण प्रतिमाओ से इसकी पुष्टि होती है। इसमें त्रिमुखी कुबेर और भोजन भट्ट के रूप में विराजित प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय है। कुबेर की प्रतिमाएं मंदिरों की मंडोवर पर ही मिलती है। कुबेर के मंदिर बहुत कम सुनने या देखने को मिलते हैं।

ओम प्रकाश सोनी

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