Friday, 5 January 2024

सुदृढ़ प्राचीर का गिरी दुर्ग कुंभलगढ़

सुदृढ़ प्राचीर का गिरी दुर्ग कुंभलगढ़

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग प्राचीन गिरि दुर्ग परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। राजस्थान में ही चितौड़गढ़, मेहरानगढ़ और सोनार किला जैसलमेर की तरह ही यह भी महत्त्वपूर्ण दुर्ग है। मेवाड़ में कुंभलगढ़ दुर्ग चित्तौड़गढ़ के बाद दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग है। कुंभलगढ़ दुर्ग ने महाराणा कुंभा के शौर्य, बुद्धिमत्ता, और वीरता की कहानियों चिरकाल तक स्मृतियों में जीवित रखा हैं। 

राणा कुम्भा के काल के निरंतर युद्ध , संघर्ष के दिनों में इस दुर्ग का विशेष सामरिक महत्व रहा है। अरावली पर्वतमाला की दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित यह दुर्ग विपत्तिकाल में मेवाड़ राजपरिवार का मुख्य आश्रय स्थल रहा है। यह दुर्ग मेवाड़ कुल भूषण प्रात स्मरणीय महाराणा प्रताप के बालपन की सुनहरे पलों का साक्षी रहा है।

कुंभलगढ़ का दुर्ग कई छोटी मोटी पहाड़ियों पर बना हुआ है। यहां के घाटियों और पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति इस तरह से बनी हुई है कि यह किला दूर से दिखाई नहीं देता है। महाराणा कुम्भा ने मंडप नामक शिल्पी के देखरेख में इस दुर्ग का व्यवस्थित रूप से निर्माण कराया था जिसके कारण इसे कुंभलमेर भी कहा जाता है।

कुंभलगढ़ दुर्ग की सबसे मुख्य विशेषता इसकी चौड़ी और लंबी प्राचीर है जिसके कारण यह दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र है। यह दीवार कई मील लंबी है। इसकी चौड़ाई इतनी अधिक है कि इस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। प्राचीर इस तरह की गहरी और तंग घाटियों से होकर बनी हुई है कि इस पर चढ़कर या इसे तोड़कर अंदर प्रवेश कर पाना असम्भव है।

दुर्ग के अंदर एक ऊंची पहाड़ी पर अन्य दुर्ग बना हुआ है जिसे कटारगढ़ कहते हैं। कटारगढ़ भी ऊंची दीवारों और बुर्ज से सुरक्षित है इसमें भी रियासतकाल के कई महल भवन आदि बने हुए हैं। यहां तक पहुंचने के लिए पैदल ही ऊपर जाना होता है। कटारगढ़ के महलों से कुंभलगढ़ के पूरे किले का नयनाभिराम दृश्य आंखो के सामने प्रस्तुत हो जाती है। दूर दूर तक घाटियों और पहाड़ियों पर फैली दुर्ग की प्राचीर का दृश्य ऐसा काल्पनिक अनुभव उत्पन्न करता है जैसे शिवजी के गले में को लिपटा हुआ भुजंग तत्पर सा बैठा हो।

महल के पीछे की तरफ़ कुंभलगढ़ के पहाड़ियो का घना जंगल और उस जंगल का प्राकृतिक सौंदर्य दुर्ग पर पहुंचने की थकान को पल भर में दूर कर देता है। इन आधुनिक महलों का निर्माण महाराणा फतेहसिंह के काल में हुआ था। महाराणा के निजी कमरों में कई मनोहर भित्ति चित्र भी बने हुए हैं।

कुंभलगढ़ दुर्ग में नीचे प्रवेश करते ही दाईं ओर यज्ञ वेदी, कुछ जैन मंदिर , नीलकंठ महादेव का मंदिर बना हुआ है। उसे आगे ढलान में किनारे बावन देवरी नामक विशाल जैन मंदिर निर्मित है। आगे भी पहाड़ियो पर कई मंदिर और भवन बने हुए हैं। यहां माना जाता है कि इस दुर्ग में 300 से भी अधिक मंदिर है जिनमे कुछ जीर्ण शीर्ण और कुछ सही अवस्था में है।

कुंभलगढ़ दुर्ग महाराणा कुम्भा के काल में लिखी कुंभलगढ़ प्रशस्ति के लिए विख्यात है। शिलालेखो पर उस दौर के जनजीवन, भौगोलिक स्थिति, मेवाड़ महाराणाओ की वंशावली, राणा कुम्भा की विजयों का विस्तार से वर्णन मिलता है। कई श्लोकों में निहित उस दौर के इतिहास को जानने के लिए यह प्रशस्ति बेहद ही महत्त्वपूर्ण है। इस दुर्ग में ही महाराणा कुम्भा की हत्या उनके पुत्र द्वारा कर दी गई थी। मेवाड़ राजपरिवार के सतत संघर्ष, वीरता, शौर्य, युद्ध आदि की घटनाओं का साक्षी रहा यह दुर्ग सदियों से लेकर आज भी किसी अजेय योद्धा की तरह अमर है।

ओम प्रकाश सोनी

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