एरन की महाकाय वराह प्रतिमा
एरन में विष्णु मंदिर समूह में दाएं तरफ पशु वराह की प्रचंड प्रतिमा स्थापित है। तेरह फिट ऊंची और बारह फिट लंबाई लिए यह मूर्ति भारत में वराह की सबसे विशालकाय मूर्तियों में से एक है। विशाल और प्रचंड जैसे शब्द शायद इसी मूर्ति को देखकर गढ़े गए हैं ऐसा आभास इसे प्रत्यक्ष देखने से होता है।
गुप्तकालीन मूर्तिकला में वराह की यह मूर्ति विशेष महत्व रखती है।वराह की प्रतिमा में मुख में जिव्हा के ऊपर देवी सरस्वती विराजित है। वहीं नारी रूपी पृथ्वी देवी वराह की दाईं दाढ़ पकड़े हुए हैं। इसके पीछे प्रलय की कथा है जिसमे भगवान विष्णु द्वारा वराह अवतार धारण कर समुद्र से पृथ्वी को बाहर निकालकर कर उसका उद्धार किया गया था।
इस कथा के अंतर्गत भारतीय मूर्तिकला में यह दो तरह की मूर्तियां बनती है पहली नृवराह की मूर्ति जिसमे उनके दांतो पर गोल पृथ्वी धारित होती है और दुसरी पशु वराह की यह वराह प्रतिमा जिसमे नारी रूपी भू देवी वराह की दाढ़ पकड़े हुए अंकित है। इस वराह प्रतिमा में बाएं तरफ से एक विशाल नाग ऊपर की तरफ उत्कीर्ण किया गया है। इसके पूरे तन पर कमंडलधारी ऋषि और देवताओं को प्रभावशाली रूप से उकेरा गया है।
वराह की यह महाकाय प्रतिमा भारतीय इतिहास में हूणो के काल की प्रतिनिधि मूर्ति है। गुप्तो के कमजोर पड़ते ही हूणो ने मालवा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और उनका नेता तोरमाण मध्यभारत का राजा बन गया था। हूण तोरमाण के राजत्वकाल का सूचनात्मक लेख इसी वराह प्रतिमा पर अंकित है। यह लेख सर्वप्रथम 1838 में कैप्टन टी एस बर्ट द्वारा खोज गया था।लेख तोरमाण के अधीनस्थ शासक धन्यविष्णु ने उत्कीर्ण कराया था।
इस लेख में तोरमाण के प्रथम राज्यवर्ष का मात्र उल्लेख है इसके अतिरिक्त हूणो की कोई जानकारी नहीं दी गई है। पूरा लेख अधीनस्थ महाराज धन्यविष्णु और उसके पूर्वजों के यशोगान का ही उल्लेख करता है। इसमें धन्यविष्णु के पूर्वज मातृ विष्णु, इंद्र विष्णु, वरुण विष्णु, हरिविष्णु की विशेषताओं को इंगित किया है। अभिलेख में धन्यविष्णु द्वारा एरीकिण में वराह का मंदिर बनाए जाने का उल्लेख किया गया है। तिथि के रूप में सिर्फ फाल्गुन मास के दसवां दिन ही अंकित है, वर्ष का उल्लेख नहीं है। अनुमानित है कि यह वराह मंदिर 485 ईस्वी से 500 ईस्वी के मध्य निर्मित हुआ है।
एरन मध्यप्रदेश के सागर जिले में स्थित है। एरन के पास के ही मंडी बामोरा एवम बीना तक रेलवे की सुविधा उपलब्ध हैं। यहां से दस पंद्रह किलोमीटर की दुरी तय कर एरन पहुंचा जा सकता है।
ओमप्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)
राज्य हेतु वराह की स्थापना... इस विश्वास से बड़ी से बड़ी वराह प्रतिमाएं बनाई गईं। यह सहिष्णु वैष्णव मत की मान्यता और पोषण का स्मारक है... विभूति और विराट स्वरूप का जैसा वर्णन गीता में है, वैसे ही रूप को विशालकाय शिलाओं, अडिग चट्टानों को तराशकर बनाया गया। वराहस्तोत्र रचे गए, वराहपुराण, वराह तंत्र और वाराही सूक्त... सामने आए। जब शैव प्रभावी हुए तो हंसवाहन ब्रह्मा की आलोचना हुई और वराह रूप विष्णु को पाताल गमन के रूप में दिखाया गया... ऐसी अनेक मूर्तियां बनाई गई हैं...। इसे वराह अरण्य के रूप में विकसित किया गया। एरिकेण नाम वही ध्वनि और अर्थ लिए है। तुम्हारे चित्र मुझे अपनी अध्ययन की मान्यताओं को कहने का अवसर दे देते हैं... चिरायु रहें।
टिप्प्णी साभार आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर 🙏
Shri Krishan Jugnu Sir





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